Saturday, 20 June 2015

इश्क़ फिजाओं में है...रूह हवाओं में है.

इश्क़ फिजाओं में है
रूह हवाओं में है.

लबों पे दुआ है मेरे 
तू दुआओं में है 

सदा दिशाओं में है 
तू सदाओं में है 

इश्क़ फिजाओं में है
रूह हवाओं में है.

~उमेश "अज़ीब"
19/06/15
11:42 PM

Thursday, 18 June 2015

मुट्ठी भर आसमां

बहुत तसल्ली दे चुके तुझे ए दिल
अब,
हासिल-ए-ज़मा चाहिए

फ़कत इक चिंगारी से कुछ न होगा
अब,
दिल में धधकती शमां चाहिए

दो गज़ जमीं नहीं 
अब, 
मुट्ठी भर आसमां चाहिए.

~उमेश"अज़ीब" 

Wednesday, 17 June 2015

एक ही बात है।

चाँद का फलक पर छा जाना
और
तुम्हारा मेरे दिल पर
एक ही बात है
तुम्हारा मेरे आगोश में समाना
या
बादल में चाँद का छिप जाना
एक ही बात है
कितनी "अज़ीब" हैं ये
कल्पनायें तुम्हें पा लेने की
शायद
सुबह के स्वप्न से भी सुन्दर...
क्योंकि
तुम्हारा मेरी जिंदगी में आना
या
किसी अधूरी ख़्वाहिश का पूरा हो जाना
एक ही बात है।
~उमेश "अज़ीब"
12/06/15
10:54PM

Wednesday, 13 May 2015

मैं.......

ख़ुदा दूर है, मैं भी खुद के पास नहीं हूँ।
बस उदासीन हूँ, पर उदास नहीं हूँ।
मुझे दुनिया से क्या छुपाना,मैं कोई राज़ नहीं हूँ।
गुनगुना लो गज़ल हूँ, फ़कत अल्फ़ाज़ नहीं हूँ।
वक़्त नासाज़ है तो क्या।
मुझे इक दौर समझना, सिर्फ कल और आज नहीं हूँ।
रुका हुआ हूँ सफ़र में चाहत-ए-मंज़िल की।
हौसला हूँ, सिर्फ परवाज़ नहीं हूँ।
बग़ावत करना मेरी सोच नहीं है।
जंग है ख़ुद से ही मेरी, पर जंगबाज़ नहीं हूँ।
~उमेश "अज़ीब"
30/04/15

मेरु मुलुक-मेरु गौं


याद आंदी च्
पुंगड्युं मा ढलकी काकड़ी क़ी
ग्वाला जयां नौनी बछड़ि की
बकरी का चिनखि की
घोलम बैठीं घुरानी घुघुती की
याद आंदी च्
दूध-भात अर घ्यू-रुट्टी की
याद आंदी च्
नौल-धार का मीठा पाणि की
थिचौड़ी-कफलि-फाणु-गौताणी की
याद औंदी च्
आरु-चुलु-खुमानी की
नौना-नौनीक खेल मा बिमानि की
याद औंदी च्
भौत कुछक जो पिछने रै ग्याई
कुछ छुट्टी गै, कुछ हमन छोङ दयाई
मि निर्भागी त परदेसी है ग्युं
पर मैँ औलु म्यारु गौं
मैं औलू
त्वे भेट्ण
एक दिन औलू
मि त न्हे जौलु एक दिन इखम बटिन
पर म्यारु गौं
तू जुगराजि रै सदा।
~उमेश "अज़ीब"
©:ucp,15
05/05/15 2.32 अपराह्न

ज़रूरी है कि.. जनगीत गाए जाएं....!!

हाँ हम मुस्कुराएंगे,
संघर्षों के दौर में,
क्यूँकि ज़रूरी है,
मुस्कुराना।

हाँ हम गुनगुनाएंगे,
संघर्षों के दौर में,
क्यूँकि ज़रूरी है,
गुनगुनाना।

हाँ साथ निभाएंगे,
संघर्षों के दौर में,
क्यूँकि ज़रूरी है,
साथ निभाना।

हाँ क्योंकि ज़रूरी है!
लड़ना अन्याय के ख़िलाफ़...
जंग जरुरी है...
ज़रूरी है कि..
जनगीत गाए जाएं....!!

आज डफली है,
कल तूती होगी,
परसों नक्कारे-नगाड़े होंगे,
और होंगे उनके साथ...जनगीत।
जो गाए जाएंगे...न्याय की खातिर।

कुछ न भी हुआ तो भी
आवाज़ होगी....
हर पल बुलंद होती हुई...और भी ज्यादा
क्योंकि ज़रूरी है
जनगीतों का गाया जाना

क्योंकि ज़रूरी है.....
......न्याय का मिलना....
हक़ का मिलना...बराबरी के लिए।

~उमेश "अज़ीब"
©:UCP
13/05/15
10:10 PM

Friday, 31 October 2014

एक था लम्बू एक थी छोटी रानी

आओ सुनोे दर्द-ए-दिल की कहानी
दिल का दर्द मेरी ही जुबानी
एक लम्बू सा नौकर था
थी एक छोटी रानी
आओ सुनो  दर्द-ए-दिल की कहानीI
सुनो बात नहीं ये पुरानी
सीधे लम्बू की छोटी  रानी थी दीवानी
छुप के देखा करती थी वो
लम्बू की कारस्तानी
दिल ही दिल में हंसती थी वो
करते देख लम्बू को नादानीI
रानी के कुछ सपने थे
रानी ने लम्बू को बताया
उसके क्या क्या सपने थे
सुनी लम्बू ने रानी की जुबानी
फिर सपने वो उसके थे
लम्बू ने जी जान लगायी
पूरा की हर एक कहानी
जो सपनो की थी जानीI
लम्बू ने डाल बन हर पल
रानी चिड़िया को उड़ना सिखाया
हर एक ताना सहा लम्बू ने
रानी को जो माना था
लम्बू ने दिल में था ठाना
रानी को कामयाब बनाना थाI
रानी का हर सपना
लम्बू का जब अपना था
हाड़ जल कर भी उसने
पूरा करने का ठाना थाI
चिड़िया अब उड़ने लगी थी
पंख हवा में यूं पसार
डाल को अब वो भूल गयी थी
जिसने सिखाने का उसको उठाया था भारI
रानी अबी आजाद हो गई करके सपने अपने पूरे
लम्बू के सपने सब यूँ ही रह गए अधूरेI
रानी ने पाया नया साथी
लम्बू को बताया लम्बी नाक का हाथीI
बोली तुम हो क्या, लगते मेरे
तुम्हारी जन्दगी में खुद हैं अँधेरेI
लम्बू ने था सपना पाला
कि रानी का जीवन हो आलाI
लम्बू ने अपना दिल तोडा 
रानी के लिए त्याग किया
और रानी ने लम्बू का भी परित्याग कियाI
बोली रानी लम्बू को-
वो तुम से है काबिल सुन्दर साथी न्यारा
मुझको वो है सबसे प्याराI
टुटा दिल लम्बू का था तब
मुड़ के भी न देखा रानी ने जब
जिसके सहारे उड़ना सीखा  रानी ने 
चली गयी चिड़िया छोड़ के वो डाली
देखो दुनिया की यही रीत निरालीI
जिसपर लम्बू ने सब न्योछावर कर डाला
उस रानी ने राह का फूल समझ कुचल डालाI
लम्बू अब है रोता रहता
किसी से कोई शिकायत न कहता
सच्चे प्रेम का यही सिला है
जो लम्बू को आज मिला है
लम्बू दिल को तसल्ली है देता
चकोर को कब चाँद
धरती को भी कभी आकाश मिला है?

©:उमेश  चन्द्र पन्त  "अज़ीब"
सर्वाधिकार सुरक्षित 


आज दिनांक 31/10/14 को रात्रि  १२:०८ पर 
स्थान-बागेश्वर (उत्तराखंड)
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