Monday, 21 November 2011

मेरे हमदम मेरे दोस्त...


मेरे हमदम मेरे दोस्त...
तू मेरी आहों में है.....
     
मेरे हमदम मेरे दोस्त...
मेरा हर एक अरमान तेरी राहों में है.....................
मेरे हमदम मेरे दोस्त...
दिल की पनाहों को तेरा इंतज़ार है
     
मेरे हमदम मेरे दोस्त...
आ के सुन, हर सांस में तेरी ही पुकार है
मेरे हमदम मेरे दोस्त...
आ भी जा
     
क़यामत से पहले, आ भी जा
आ भी जा..
इससे पहले के..मेरी आहों का दम निकले
     
इससे पहले के.....तेरे कूचे से "ज़नाजा-ए-हम" निकले.
मेरे हमदम मेरे दोस्त...
ऐ मेरे हमदम ऐ मेरे दोस्त....उमेश चन्द्र पन्त "अजीब"....

एक दीप जलायें


आओ एक दीप जलायें
नयी आशा का
एक दीप जलायें
जिसकी किरण
भेदभाव का दाग मिटाए
आओ हम एक दीप जलायें
जिसकी "ज्योत"
प्रकाश फैलाये
ज्ञान का
सत्य का
उम्मीद का
प्रेम का
आओ हम एक दीप जलायें....उमेश चन्द्र पन्त "अज़ीब"....

आहुति


खुशियाँ.....पूछता है ये ह्रदय मेरा...हैं कहाँ?
खुशियाँ..मांगता है ह्रदय मेरा वापस मुझ से
उम्मीदें....हैं बची क्या कुछ?
पूछता है...मुझसे बड़ी उम्मीद से मेरा ह्रदय, मुझ से
राहें...गुम हो गईं कहाँ?..
मेरी मंजिलों की ..पूछता है, मुझसे मेरा ह्रदय..
रातें... क्यूँ हो गई हैं सदियों सी लम्बी
दिन...मीलों से लम्बे
क्यूँ हो गए, पूछता है मुझ से मेरा ह्रदय
हैरान हूँ में, सुन कर ह्रदय की बातों को
हैरान हूँ मै, के ह्रदय कैसे कर रहा है
इन प्रश्नों को मुझ से
क्यूँ नहीं समझता ह्रदय मेरा, मजबूरी मेरी
कैसे समझाऊँ उसे...के
ऐ ह्रदय .....................तुझे कुछ अनुभव न होगा अब.
तुझे मार डाला गया है..
तू अब निष्प्राण हो चुका है.....आहुति दे चुका है तू अपने प्राणों की
अपने प्राणप्रिय के लिए....उमेश चन्द्र पन्त "अज़ीब"....

दोस्त..


दोस्त..

एक दोस्त..बेहद अजीज़ एक दोस्त 
दिल के बेहद करीब था 
वो दोस्त 
बहुत प्यारा...सलोना मुखड़ा 
और एक खूबसूरत दिल लिए हुए,
था वह दोस्त
आँखों मै उसके एक नूर था 
दोस्ती के नाम पर कोहेनूर था 
मेरा वह दोस्त....
बस अब यादों में मेरे साथ है 

एक इत्र की शीशी 
एक कलाई घड़ी
और दोस्ती के एक धागे
के रूप में 
सम्हाला है मैंने
और दिल में जगह दी है 
मैंने उस दोस्त को....उमेश चन्द्र पन्त "अज़ीब"....

देश पुकारता है...

उठ जागो, के अब देश पुकारता है...
दिशाएं ये गीत गाती तो हैं
उठ तेरे लहू की है अब जरुरत..
अंतर्मन से ये आवाज आती तो है..

लाऊँगी मैं, सुख का सवेरा ..
सांझ ये गीत गुगुनाती तो है.
तमाम अंधेरों के बीच, उम्मीद की एक किरण
और कुछ न सही, शाबासी पाती तो है....उमेश चन्द्र पन्त "अजीब"....

..प्रियतम..

..प्रियतम..

मेरे ह्रदय में वास करने वाली
मेरी जीवन संगिनी
ओठ ....रस के प्याले हैं...तुम्हारे
मदमस्त हो जाता हूँ में
उठा लेता हूँ जब भी में "चसक" उन की नाम की
नित गोता लगता हूँ,मैं
तुम्हारे नेत्रों की "गहराइयो" में
और कभी डूब सा जाता हूँ
उन में, शायद फिर न कभी उबरने के लिए

प्राणप्रिये...मेरी हमसाया
कर देती हो..घना काला अंधेरा ...
भोर की किरणों को भी छुपा लेती हो आगोश में
अपने घने लम्बे गेसुओं को जब फैला लेती हो
झटकती हो, जब उनसे पानियों के छींटे
काली घटा के साथ मानो सावन सा, उमड़-घुमड़ कर आ जाता है
पके हुए सेबों के मानिंद हल्की लालिमा छा जाती है
गालो में तुम्हारे...जब प्रेम भरी नज़रों से में देखता हूँ, प्रियतम तुम्हे.
ललाट में लगी हुयी..बिंदी तुम्हारी
पूरणमासी के चाँद के तरह लगती है...चांदनी फैलाती हुयी प्रतीत होती है

अखिल विश्व को प्राप्त कर लेता हूँ मैं,
मुझे अंक में लेके मेरे..केशों पर हाथ फेरती हो तुम मेरी प्रियतम

संपूर्ण हो जाता हूँ मैं,
बाहुपाश में बाँध लेते हो तुम मुझे जब-जब भी
तमाम मुश्किलें दूर हो जाती हैं...मुखड़ा जब भी याद आता है तुम्हारा
प्रियतम..मेरे ह्रदय में वास करने वाली
मेरी जीवन संगिनी....उमेश चन्द्र पन्त "अजीब"....

तुम


खिला है चाँद फलक पर
चांदनी रात है
मन मेरा फलक है
पर मेरा चाँद तो तुम हो

फिजां रंगीन है
खिले हैं गुल, गुलिस्तां मैं
दिल मेरा गुलिस्तां है
पर मेरा गुल तो तुम हो

रोशन हैं चिराग़
है शाम--महफ़िल
दिल मेरा महफ़िल है
पर मेरा चिराग़ तो तुम हो

शायरी है जवां
है, बज़्म--सुवरा
दिल मेरा बज़्म--सुवरा है
पर मेरी शायरी तो तुम हो....उमेश चन्द्र पन्त "अज़ीब"....