Monday, 26 March 2012

पाकली हिसालु


हिसालु-हिसालु
डांडी-काँठीयुं मां पाकली
भरी जाला झीत-केड
थाली भरून, भरून पलेट
दिखुन सब्बू कें
पकड़ी जाल दगडू दिन दोफरी में
इथ्के-उथ्के देखि बेर ऊ खिसालू

हिसालु-हिसालु
पाकली हिसालु
चोरी नि करो यारो
मुह्न दा रिसालू

हिसालु-हिसालु
डांडी-काँठीयुं मां पाकली
पिन्न्गल रंग छु
कान्नक संग छु
गाड़-भाँगड़ नि कुटो रन्कारो
भीना दांत्पाटि पीसालु

हिसालु-हिसालु
डांडी-काँठीयुं मां पाकली
पाकली हिसालु....उमेश चन्द्र पन्त 'अज़ीब'....


Saturday, 10 March 2012

मन की रानी,....


माछापुच्छी को चूलि मा ह्युं खत्त्यो
गंडक को चिस्यो पानी
मौ छुं तिम्रो मन को राजा
तिमि मेरो मन की रानी,

तिमिले दियो पिरती को ज्ञान
मौ बनी गयो ज्ञानी
यो मन को तिर्खा लागी
कां पाएंछ रूप को पानी?
मलाई दीदेऊ तिम्रो जोबन
भैई जाओ दानी

मौ छुं तिम्रो मन को राजा
तिमि मेरो मन की रानी,
माछापुच्छी को चूलि मा ह्युं खत्त्यो
गंडक को चिस्यो पानी (नेपाली)....उमेश चन्द्र पन्त "अज़ीब"....

दोस्ती के नाम-

तिम्रो र मेरो जनम भरी को संग हो, ओ संगी,
मॉ ता तिम्रो रंग मा छौं रंगी.
तिम्रो शरीर, मेरो प्राण हो,
मेरो मन तिम्रो जान हो.
संगी मेरो, मेरी शान हो,
संग हाम्रो भोतई महान हो(नेपाली)....उमेश चन्द्र पन्त "अज़ीब"....

Monday, 9 January 2012

पहाड़ अंतिम समय मैं छु


भाभरकी भाबरियोव में नि भबरीणो
घर आओ
वां को छु अपण?
जब के नि रोल, काँ जला
कि कौला? कै मुख दिखाला?
फिर अपण जस मुख ल्ही बेर आला
आई ले 'टैम' छु
आओ, अपन जड़-जमीन पछियाणो
याद करो ऊ गाड़-भीड़
जो तुमार पितरनैल कमाईं
ऊ घर-बार
जो अफुं है बेर ले बाहिक समाईं

अरे भायो लाली
तुम कुंछा-पहाड़ में के नहातन आब
जब तुमे न्हेता
बाहिक के चें

तुम कुंछा-नेता लोग नैल पहाड़ चुसी हालो
मैं कूं-तुमुल त पहाड़ छोड़ी हालो

आओ यारो यस नि करो
हमर पहाड़ बर्बाद है गो
के करो यारो
जब जड़ सुखी जाल
बोट हरी नि रै सकन
अपण गौं-घर छोड़ी बेर
कैक भल नि है सकन
पहाड़ अंतिम समय मैं छु
फिर जन कया---
हमुल मुख ले नि देख सक................उमेश चन्द्र पन्त "अज़ीब"    

Thursday, 29 December 2011

1आज पीने का मन है,2पंखुड़ी-पंखुड़ी, पात-पात.


1आज पीने का मन है
मुहब्बत से भी जियादा, और भी गम हैं जिंदगी में
आओ हमप्याला बनो.

2पंखुड़ी-पंखुड़ी, पात-पात
सरोबार हैं, 'शबनम' से
आओ पीते हैं
कुछ उधारी उन से भी सही.

Monday, 26 December 2011

जिंदगी..ख़ूबसूरत है....


जिंदगी..ख़ूबसूरत है,
बहुत खूबसूरत
तितली के पंखों सी,
कभी फूलों सी,
पूनम की रात सी,
खूबसूरत है ...तुम्हारी कही किसी बात सी.
जिंदगी..खूबसूरत है
निश्छल,निष्कपट,
शिशु की मुस्कान की तरह,
खूबसूरत है..जिंदगी
उस समीर की तरह
शाम को मंद-मंद बहते हुए जो..माहौल में गुलाबी ठंडक ला देती है
जिंदगी खूबसूरत है...उससे भी ज्यादा जितना के वो हो सकती है.

Saturday, 24 December 2011

आओ चलें:उमेश चन्द्र पन्त: मिलन : क्षणिकाएं

आओ चलें:उमेश चन्द्र पन्त: मिलन : क्षणिकाएं: 1- चांदनी न सही , अमावस की रात होगी मैं आऊंगा उसी जगह इस उम्मीद के साथ के तुम मिलोगी मुझे इंतज़ार करते हुए . 2- आओ मिलो कभी अमराई में प्...