Sunday, 3 June 2012

युवा


सड़क के किनारे
पुराने से मकान
की तीसरी मंजिल 
पर बने हाल 
की दूसरी 
टेबल को
घेर कर जुटे हुए 
कुछ युवा
स्नूकर के
प्लस, माईनस
के गणित 
में उलझे हुए
फेरारी की तेज़ी  
और
अवतार के एनीमेशन
के जादू में 
फंसे हुए
रुपये की
गिरावट 
डालर की मजबूती 
के चर्चों के बीच
गंभीर
पेशानों पर लकीरें 
बनाते हुए

पर दूसरे ही पल
युवतियों की बातें 
ट्रिपल एक्स डीवीडी 
और सिगरेट 
के कशों 
से निकले हुए 
धुएं 
के गुब्बारों 
के साथ 
मिले जुले 
ठहाकों के स्वरों 
को जोड़ते हुए,

खिलंदड़ा 
स्वभाव 
लड़कपन 
को साथ लेकर
युवा जोश पर 
हावी
 होता
 चला
 गया
 है....उमेश चन्द्र पन्त 'अज़ीब
(०३ जून २०१२ रात्रि ११ बजकर ३१ मिनट)

Friday, 20 April 2012

साड़-ताड़


लागि रईं बैसागाक साड़-ताड़
पाकि गयीं सब्बे गाड़.

पिंगाल-पिंगाल ग्यूँका बाल
पिंगई पड़ी गै गैर में
ग्यूँ मुठ, नलो ले भरी पटांगणं
लागण पै गयीं ताड़.

ताड़नकी चूटा-चूट
और मुंगार्नक धूसा-धूस,
ग्यूँका दाण छटकनी इथ-उथ
चाड़ प्वाथ्नक लुछा-लूछ.

घाम लगी गो मिसिर-पाणि ल्यावो
बुतिकारनक करो पूछ.

मोहन दा थ्वाड़े बुति ले करो
खाल्ली पोई रईं तुमार मूंछ.

पवु लगे बेर लगुंछा ताड़
हो-बल्द आल
को कराल तुमार गाड़न खालि...

मेहनत करो सीखो भौल
तुमार नानतिन तब सुखी रौल.

....उमेश चन्द्र पन्त "अज़ीब"....

Thursday, 12 April 2012

कुछ कर गुजरना है


न जा तू खुद से दूर
कि कुछ कर गुजरना है
कर ले शिकवे-गिले दूर
कि कुछ कर गुजरना है
तू कोशिश तो कर, मान के चल
फिर तो ज़माने को सुधरना है
साथ चल कि
भीड़ को शक्ति में बदलना है
राख ही सही तू जान फूंक
कि युवा खून को उबलना है
अब उठ हो खड़ा
कि तुझे, तेरी उबासी को जोश में बदलना है
लड़कपन को भूल कि
तुझे ज़माने की चाल को बदलना है
भूल जा के तू कौन क्या कर सकता
कि तुझे इसी सोच को बदलना है
सीना फैला कि
देश को तेरे कांधों पे ही सम्हलना है
हार न मान
कि जीत को तेरे क़दमों में सिमटना है
हाथ बढ़ा
कि तकरार कि इस लकीर को मिटना है
तू बढ़ा हौंसला अपना
कि उनके इरादों को तमाँचों में पिटना है....उमेश चन्द्र पन्त 'अज़ीब'....

Monday, 26 March 2012

पाकली हिसालु


हिसालु-हिसालु
डांडी-काँठीयुं मां पाकली
भरी जाला झीत-केड
थाली भरूनभरून पलेट
दिखुन सब्बू कें
पकड़ी जाल दगडू दिन दोफरी में
इथ्के-उथ्के देखि बेर  खिसालू

हिसालु-हिसालु
पाकली हिसालु
चोरी नि करो यारो
मुह्न दा रिसालू

हिसालु-हिसालु
डांडी-काँठीयुं मां पाकली
पिन्न्गल रंग छु
कान्नक संग छु
गाड़-भाँगड़ नि कुटो रन्कारो
भीना दांत्पाटि पीसालु

हिसालु-हिसालु
डांडी-काँठीयुं मां पाकली
पाकली हिसालु....उमेश चन्द्र पन्त 'अज़ीब'....


Saturday, 10 March 2012

मन की रानी,....


माछापुच्छी को चूलि मा ह्युं खत्त्यो
गंडक को चिस्यो पानी
मौ छुं तिम्रो मन को राजा
तिमि मेरो मन की रानी,

तिमिले दियो पिरती को ज्ञान
मौ बनी गयो ज्ञानी
यो मन को तिर्खा लागी
कां पाएंछ रूप को पानी?
मलाई दीदेऊ तिम्रो जोबन
भैई जाओ दानी

मौ छुं तिम्रो मन को राजा
तिमि मेरो मन की रानी,
माछापुच्छी को चूलि मा ह्युं खत्त्यो
गंडक को चिस्यो पानी (नेपाली)....उमेश चन्द्र पन्त "अज़ीब"....

दोस्ती के नाम-

तिम्रो र मेरो जनम भरी को संग हो, ओ संगी,
मॉ ता तिम्रो रंग मा छौं रंगी.
तिम्रो शरीर, मेरो प्राण हो,
मेरो मन तिम्रो जान हो.
संगी मेरो, मेरी शान हो,
संग हाम्रो भोतई महान हो(नेपाली)....उमेश चन्द्र पन्त "अज़ीब"....

Monday, 9 January 2012

पहाड़ अंतिम समय मैं छु


भाभरकी भाबरियोव में नि भबरीणो
घर आओ
वां को छु अपण?
जब के नि रोल, काँ जला
कि कौला? कै मुख दिखाला?
फिर अपण जस मुख ल्ही बेर आला
आई ले 'टैम' छु
आओ, अपन जड़-जमीन पछियाणो
याद करो ऊ गाड़-भीड़
जो तुमार पितरनैल कमाईं
ऊ घर-बार
जो अफुं है बेर ले बाहिक समाईं

अरे भायो लाली
तुम कुंछा-पहाड़ में के नहातन आब
जब तुमे न्हेता
बाहिक के चें

तुम कुंछा-नेता लोग नैल पहाड़ चुसी हालो
मैं कूं-तुमुल त पहाड़ छोड़ी हालो

आओ यारो यस नि करो
हमर पहाड़ बर्बाद है गो
के करो यारो
जब जड़ सुखी जाल
बोट हरी नि रै सकन
अपण गौं-घर छोड़ी बेर
कैक भल नि है सकन
पहाड़ अंतिम समय मैं छु
फिर जन कया---
हमुल मुख ले नि देख सक................उमेश चन्द्र पन्त "अज़ीब"