Monday, 22 June 2015

इक वक़्त होगा बेवक़्त सा जब तुम मुझसा दीवाना ढूंढोगे।

इक वक़्त होगा बेवक़्त सा जब
तुम मुझसा दीवाना ढूंढोगे।
हिज्र की दीवार पे होकर खड़े
हँसने का बहाना ढूंढोगे।
खोल कर दिल की किताबों में अपनी
खोए इश्क़ का फ़साना ढूंढोगे।
वो वक़्त दूर नहीं अब जब
महफ़िल में अनजाना ढूँढोगे।
यादों के सिलसिले चलेंगे जेहन में तुम्हारे
गीत होगा पर तराना ढूंढोगे।
इक वक़्त होगा बेवक़्त सा जब
तुम मुझसा दीवाना ढूंढोगे।
~©:उमेश "अज़ीब"
22/06/15
1:47 PM

1 comment:

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